• आधी रात और सुबह के बीच
सुंदर सी ढलती शाम और दोस्तों के साथ हर बात पर गौर करना और खुशियों की बरसात, जैसे रात की गोद में सोने को तैयार दिनभर की थकी हुई उलझन, साथ ही विश्वविद्यालयों के सीनियरो के साथ चाय पीना व आजाद पार्क में तर्क वितर्क कमाल ।
पता नहीं अक्सर दोपहर से शाम होते हुए देख डर सा क्यों लगता है? रात सोच और सपनों, ख्वाबों से भरी होती है और बहुत से सवाल उठाती है उलझते, सुलझते नींद की आड़ में दिल और दिमाग में एक तूफान, हलचल जैसे डर डर सा जाता है।
मुझे रात से कोई बैर नहीं ना चांद से मेरी दुश्मनी सुबह से कोई खास दोस्त भी नहीं और आसमान नहीं जानता कोई राज मेरी, पर फिर भी सूरज से मेरा इश्क हो गया और रात से मनो डर सा रहता है । क्योंकि जब खुद से मिलता हूं सवाल नहीं बदलते और जवाब तो आप जानते ही हैं इनका कोई ठिकाना नहीं, पहले जार्जटाउन से लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी तक यात्रा कर लेता हूं । लेकिन रात होने पर फिर सोचता हूं कब, क्यों, कैसे, जैसे मन ही मन रुकता नहीं हर पल कुछ न कुछ खोजता ढूंढता रहता हूं, न जाने इस बेचैनी के पीछे किस अह्सास, वादे की तिजोरी है जो अब तक तालो से लदी हुई है ।

