जीत की चाहत मे कब हार गया पता ही नही चला।

भोली सूरत पर कब दिल बार गया पता ही नही चला।


अल्हड़ सा मदमस्त घूम रहा था,

छत पर बैठे-बैठे धूप सेंक रहा था,

उसने कपड़े उठाते उठाते कब मेरा दिल उठा लिया पता ही नही चला ,

जीत की चाहत में कब हार गया पता ही नही चला।



अजीब बेरुखी सी थी जिंदगी में,

दिन में भी बस रात ही रात थी जिंदगी में,

उसके आने से कब सवेरा हो गया पता ही नही चला ,

जीत की चाहत मे कब हार गया पता ही नही चला।



सुबह से शाम बस तुझमें ही खोया रहता था,

जुदाई में भी मन ही मन हार पल तुमसे मिलता रहता था,

उस कल्पित मुलाकात में कब इजहार हो गया पता ही नही चला

जीत की चाहत मे कब हार गया पता ही नहीं चला।




मन में जोश था उससे बात करने का,

आगोश था उसे बाहों में लेने का,

चाहत थी उसपर विजय की,पर कब पराजित हो गया पता ही नही चला,

जीत की चाहत मे कब हार गया पता ही नहीं चला।