वीर तुम डटे रहो
अपनी राह में अडिग रहो
लाख रोशनी आयेंगी
अपना तेज दिखाएंगी
तुमको बहलायेंगी, फुसलायेंगी
लेकिन वीर तुम डटे रहो
अपनी राह में अडिग रहो।
उस तेज सूरज की किरणों में
चांद भी तो डट जाता है
माना फीका पड़ जाता है
लेकिन वह अड़ जाता है
वीर तुम डटे रहो
अपनी राह में अडिग रहो।
समय का चक्र कब रुकता है
माना कुछ क्षण विपरीत हो जाता है
लेकिन वीर भी डट जाता है
समय का रुख पलट जाता है
वीर तुम डटे रहो
अपनी राह में अडिग रहो।
तूफानों को जिसने रोका है
अपना सर्वस्व जिसने झोंका है
वही पाषाण के हृदय पर
अपनी पताका फहराएगा
जब मेहनत की बूंदों से
धरती से लेकर आसमान तक
तिरंगा ही लहराएगा
तिरंगा ही लहराएगा
वीर तुम डटे रहो
अपनी राह में अडिग रहो...।
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अनुज खर्ब


