ये मकड़ी के जाल-सी फैलकर

बिछाकर शिकंजा कसती हैं

फिर शिकार को अपनी ओर आता देख

पल भर में ही लपकती हैं।


ये दाँतो के बीच फंसी हुई

रोटी के कोर की तरह हैं

जो पिसते-पिसते भी अटक गयी हैं।


ये कुछ समय बाद

प्लाक बनकर

खोद डालेंगी सारी ज़मीन

और रह जाएंगी वहाँ खोखली इमारतें

जो रह-रह कर चीस(दर्द) देंगी

और एक दिन सब ढह जाएंगी

बचेंगे बस असंख्य छोटे-छोटे टीले

खण्डर हुई उलझनों के।


हाँ ! यह क्रम यूँ ही चलता रहेगा

कि पुरानी अटकी हुई हैं

इन दरख्तों पर

जो सुलझ नहीं पाती

न जाने कितनी उलझने रोज़ जन्म लेती हैं...।

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अनुज खर्ब