
मैं रेत बनकर चट्टान से अलग हो जाऊँगा
तुम हवा बनकर मुझे उड़ा लेना
फिर दूर किसी वीरान में
टीला मुझे बना देना...
फिर सफ़ेद रुई-सी
उन स्याह घटाओं को
मेरी भुरभुरी रेत पर निचोड़
तुम उजले रूप में आ जाना...
तब मैं पाकर
उस नमी के शीतल स्पर्श को
महसूस करूँगा
तुम्हारे होने के हर उस क्षण को
जब तुमने मेरे मन के अधूरेपन को
अपने पूर्ण के साथ स्वीकारा था...
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