मैं रेत बनकर चट्टान से अलग हो जाऊँगा

तुम हवा बनकर मुझे उड़ा लेना

फिर दूर किसी वीरान में

टीला मुझे बना देना...


फिर सफ़ेद रुई-सी

उन स्याह घटाओं को

मेरी भुरभुरी रेत पर निचोड़

तुम उजले रूप में आ जाना...


तब मैं पाकर

उस नमी के शीतल स्पर्श को

महसूस करूँगा

तुम्हारे होने के हर उस क्षण को

जब तुमने मेरे मन के अधूरेपन को

अपने पूर्ण के साथ स्वीकारा था...


बस इस बार

जकड़ लूँगा अपनी मिट्टी को

कस लूँगा उन ढीले हुए रिश्तों को

तान दूँगा भावो के बन्धन की हर उस डोर को

जो तुम्हारे नाम से बज उठती है...


लेकिन हर बार की तरह

बन चट्टान फिर एक बार

मैं तनकर खड़ा हो जाऊँगा

तुम पवन के उन वेगों से

मेरी अकड़ को रेत बना देना

तुम हवा बनकर मुझे उड़ा लेना

फिर दूर किसी वीरान में

टीला मुझे बना देना...।

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अनुज खर्ब