जब रात थक कर सो गयी थी
और लहरें हमें स्पर्श करने की कोशिश में
अपनी सीमाओं को लांघ रही थी
तब पैरों के नीचे की रेत
हमारी उंगलियों को अपने अंदर
थामे बैठी थी
उधर लहराती हवा कानों के समीप पहुँच
सनसनी पैदा कर रही थी
चांद और चांदनी के बीच
ख़ामोश हम दोनों
अपने होने को पूर्णतः महसूस कर रहे थे
हर एक पल में हमारा भेद
कम होता जा रहा था
दिल ने दिल से मन की बात आज की थी
तुम और मैं कब हम
और फिर ये सारे नाम बेमानी हो गए...।
अनुज खर्ब

