ट्रेन अकेली चले जा रही थी
अँधेरी रात में
वो दौड़ती
हवा से ग़ुफ़्तगू करती
और कभी चिल्लाती
मानो किसी से कुछ कहना चाहती हो
कही अनजान रास्तों पर ठहरती
जहाँ दूर दूर तक अँधेरा चादर फैलाये हुए था
कुछ इस तरह शांत
कि प्रकृति भी थक कर सो गयी हो
लेकिन कीटों में अजीब सी बेचैनी थी
वह सर्रर्ररर सर्रर्ररर की आवाज
मेरे कानो में गूँज रही थी
लेकिन लोग बेसुध थे
नींद के आगोश में
बस जिसको जहाँ अवसर मिला था
उसने वहा अधिकार जमा लिया था
बाहर पटरियों की कड़ कड़ आवाज़
और उस पर रेंगती ट्रेन
एक दूसरे को जकड़े हुए थी
जैसे धृतराष्ट्र को संजय की आँखे
ले जा रही हो कुरुक्षेत्र
उसके गंतव्य की ओर
फिर अचानक स्टेशन का शोर
तम को चीरता हुआ प्रकाश
और सब कुछ छिप गया
उस रोशनी में...।
_____________
अनुज खर्ब


