सूरज भी जब मन्द पड़कर
आराम करना चाहता हों
साँझ की देह में फैली गोधूलि
धरती पर लौट आना चाहती हों
उस समय भी तुम मुझमें
सवेरे की तरह रहकर
ताजी श्वास भर देती हों।
और कुछ समय पश्चात ही
उस अंधकार में
चाँद अपनी तारों की सेना लेकर
स्वयं चमकता है।
हमेशा की तरह
सेना टिमटिमाती है।
उसी क्षण धरती पर मौजूद झींगुर
मिलकर प्रकृति को लोरी सुना
सुला रहे होते हैं
लेकिन
तब भी तुम
मेरे ख़्वाब बुन रही होती हों
बिना कुछ बोले
हर बार नई ऊर्जा के साथ।
फिर वह रात थोड़ा ठहरती है
कुछ पलों के साथ
और समय ढ़ल जाने के बाद
जब अगली सुबह को देखता हूँ
कि बंद चार दीवारों की
खिड़की और दरवाजा खुले है
तो लगता है
आज फिर कोई रहने आया है।
सच मानो
इस घर में जब से तुम आई हों
यह सोता नहीं केवल धड़कता है...।
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अनुज खर्ब


