कितना सरल होता है
चीजों को आगे से नहीं
पीछे से उठा लाना
और तुम कहते हों
कि साहस है अभी
क्योंकि तुमने अब तक
तख्तियों को इस तरह
नाम मिटा-मिटा कर पलटा हैं।
और लिख डाला है अपना नाम
सुनहरे अक्षरों में गर्व से।
लेकिन कब तक घिसोगे
दूसरे की तख्तियों को
यूँ रगड़-रगड़ के।
एक दिन तो समय
तुम्हारा हिसाब लेगा।
उस दिन
न ये तख्तियां होंगी
न तुम्हारा नाम
और
जिसने भी बेचा था ईमान कलम का
जिसने भी चतुराई से उसे पलटा था
पदच्युत कर दिए जाएंगे सब...।
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अनुज खर्ब


