बचपन में सपनों के संग चलना सीखा

कदम-कदम पर मंजिल को

अपनी आँखों मे भरकर

दौड़ना सीखा...


स्कूल से चले तो 

कई रंग के सपने थे आँखों में

कॉलेज पहुँचे तो

उड़ना सीखा...


कितना नीचा होने लगा था आसमान उस समय

हर दूरी को मिटा दिया था

जैसे कुछ रहा ही न हो मध्य

फिर कॉलेज से निकले तो

सपनो के महलो की ओर

परिंदे बन पीछा करना सीखा...


उड़ते रहे यूँ कुछ आसमान में

ये दुनिया कितनी छोटी हो गयी थी

ये नीला आकाश 

जिसका कोई छोर नही

उसमें पहली बार भटकना सीखा...


न रास्ता दिखाया

न बताया किसी ने

थककर नीचे उतरे तो 

भूख में पहली बार 

पसीना बहाना सीखा...


आसमान धीरे -धीरे ऊँचा होने लगा था

और ज़मीन काली

पहली बार तली को घिसना सीखा...


याद है कितने सेलेक्टिव थे 

जब घर से निकले थे

तप्ति धूप को देखा तो

ऑप्शन्स को भूलना सीखा...


कितना ऊँचा हो गया था आसमान अब

और हम कितने बौने

सच में

बेरोजगारी में हमने रेंगना सीखा 

बेरोजगारी में हमने रेंगना सीखा ...

___________

अनुज खर्ब