कुछ पल ठहर जाना चाहता हूँ

उन लम्हों के साथ

जो बुलबुले की तरह

आज भी आकर

चेहरे पर भीनी-भीनी

हल्की-सी

मुस्कुराहट छोड़ जाते है।


जब जाते-जाते फूटते है पट से

तो अब भी टीस देते हैं

न भूलने के लिए...


हाँ! सारे ख़्वाब

याद है मुझे

अकेले में खोल लेता हूँ जिन्हें

और वे मुझे मेरे होने का एहसास करा जाते हैं...

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अनुज खर्ब