रात चुप्पी साधे
देखती है हर रोज़
अपना अकेलापन।
वह नहीं मुस्कुराती
पूर्णिमा के चांद पर।
वह नहीं रोकती
कभी चांद की गति।
जानते हुये कि
वह उसे देगा अमावस्या।
वह मौन साधे
देखती है हर रोज़
अपना अकेलापन...।
~अनुज खर्ब/@AnujKharb2


रात चुप्पी साधे
देखती है हर रोज़
अपना अकेलापन।
वह नहीं मुस्कुराती
पूर्णिमा के चांद पर।
वह नहीं रोकती
कभी चांद की गति।
जानते हुये कि
वह उसे देगा अमावस्या।
वह मौन साधे
देखती है हर रोज़
अपना अकेलापन...।
~अनुज खर्ब/@AnujKharb2