प्रेम के ढ़ाई अक्षर's image
707K

प्रेम के ढ़ाई अक्षर

पहला अक्षर


रेत बनकर

उड़ रहा था हर तरफ

तेरी नमी पाकर ज़मीन मिल गई

जैसे समय फिसल रहा हों

मुट्ठी से मेरी

तुझे थाम पकड़ बन गई।


दूसरा अक्षर


आ ओढ़ लूँ तेरा मखमली लिबास में

रजाई की तरह

छू लूँ तेरी गर्म सांसों को

अपनी सांसों में इस तरह

कि उलझ जाए जाल की तरह

फिर उलझी हुई सांसों की डोर

सुलझाए हम पल-पल ठहरकर।


आ जी लूँ तुझे ज़िन्दगी की तरह

पहाड़ पर बने झरने की तरह

झर-झर कर गिर जाऊ तुझ पर आज मैं,

बदन पर मचलती बूंद की तरह।


बह जाऊ तुझमें आज मैं

नदी में चलती कश्ती की तरह

आ कल-कल गोते खाये हम

प्रेम के समन्दर में डुबुक-डुबुक।


आधा अक्षर


आज फिर अड़ंगी दे दी प्रेम ने

मुँह के बल गि

Read More! Earn More! Learn More!