पहला अक्षर


रेत बनकर

उड़ रहा था हर तरफ

तेरी नमी पाकर ज़मीन मिल गई

जैसे समय फिसल रहा हों

मुट्ठी से मेरी

तुझे थाम पकड़ बन गई।


दूसरा अक्षर


आ ओढ़ लूँ तेरा मखमली लिबास में

रजाई की तरह

छू लूँ तेरी गर्म सांसों को

अपनी सांसों में इस तरह

कि उलझ जाए जाल की तरह

फिर उलझी हुई सांसों की डोर

सुलझाए हम पल-पल ठहरकर।


आ जी लूँ तुझे ज़िन्दगी की तरह

पहाड़ पर बने झरने की तरह

झर-झर कर गिर जाऊ तुझ पर आज मैं,

बदन पर मचलती बूंद की तरह।


बह जाऊ तुझमें आज मैं

नदी में चलती कश्ती की तरह

आ कल-कल गोते खाये हम

प्रेम के समन्दर में डुबुक-डुबुक।


आधा अक्षर


आज फिर अड़ंगी दे दी प्रेम ने

मुँह के बल गिरा धड़ाम से

सोचता हूँ थोड़ा लड़ लू उससे

लेकिन ताकत नहीं है,

ज़ख्म हरा है और मरहम पुराना

क्यों न फिर एक बार प्रेम कर लूँ मैं...।

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अनुज खर्ब




नोट:- मोहरे तो नही बन रहे आप किसी शतरंज के, जहाँ आपके 'प्रेम के ढ़ाई अक्षर' घोड़े की ढ़ाई चाल चल रहे हो। जिसमें आप अपने राजा/रानी को बचाते हुए, दूसरे के राजा/रानी को मार गिराना चाहते है। या यूँ कहूँ-


        बिसात बिछ चुकी है

        खेल शुरू होने वाला है

        प्रेम के ढ़ाई अक्षर

        आज घोड़े की चाल चलते है ...।


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अनुज खर्ब