तुम किसी प्ले की

ऑडिटोरियम में गूँजती 

तालियों की गड़गड़ाहट हो

जो अंधेरे में

कुर्सियों पर

पंखों की सहलाती हवा के साथ

बज उठती है

मैं किसी नुक्कड़ नाटक 

का डफली वाला पात्र हूँ

जो डफली को बजा बजाकर

उच्चे स्वरों के साथ

चलती राहों में

अपने दर्शक को खोजता है...।

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अनुज खर्ब