पिता होना आसान नहीं

मन में जितनी भी आह हों

मुस्कुराना होता है

वह टूट नहीं सकते

उन्हें टूटने का हक़ भी तो नहीं

परिवार हर समय 

टकटकी लगाये उनकी तरफ 

आस भरी निगाहों से देखते हैं

फिर चाहे उनका दिल कितना भी नम क्यों न हों

लेकिन आँखें नहीं होती

उन्हें पता हैं

जब-जब वह घर से निकलते हैं

एक उम्मीद से उनको भेजा जाता हैं

और जब लौटते हैं

तो खाली हाथ नहीं लौटते

लेकिन कोई नहीं पूछता

ये जूते घिसें क्यों हैं

ये हाथों में दरारें क्यों हैं


मगर

पिता क्या हैं?

पिता वो छत हैं

जो बारिश में, धूप में

हमारे ऊपर होती हैं

वो दीवार हैं

जो हर आंधी से पहले जूझती हैं


पिता जिम्मेदारियों से

चलती हुई वो गाड़ी हैं

जो सपनों को पूरा करने के लिए

कीचड़ में भी बिना हिचके उतर जाती हैं


पिता वो बरगद के पेड़ हैं

जिस पर असंख्य जड़ लटकी हैं

और चुपचाप

बिना किसी सवाल के

वो सभी को थामें खड़े हैं

सच में

पिता होना आसान नहीं

पिता होना आसान नहीं

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अनुज खर्ब