पार्ट-१


दीवारों के भीतर

अपने ही फूल को कैदकर

रोज़ घर से निकलता

अद्भुत वह दो पाया नर...

कदम बढ़ाकर

जब वह चलता

झाँक दूसरों के घर

यूँ दिन-दहाड़े दीवारों को लांघता

तकता उनके फूलों को जीभर

फिर कुछ क्षण ठहरकर

मौका पाते ही टूट पड़ता

वह खिलते फूलों पर अकसर...

दम्भ भरकर वह हँसता

अपने दांतो को तेजी से कट-कटाता

लपलपाती जीभ से लार टपकाता

और डोली से पहले ही डाल तोड़

उन्हें पृथक कर जाता...


पार्ट-२


अभिमान से चूर

कदम जब लौटते घर

अपने ही फूल को देख चौखट पर

पल-पल बिलखता वह झर-झर...


तब बिखरे हुए फूल को समेटता

तो याद करता वह अंतिम पल

'मुझे अब न तोड़ लेना तुम

पीला जो हो गया हूँ

महक घोल जीवन में

अब मैं खिल गया हूँ...'।

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अनुज खर्ब

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