उड़ती पतंग

बंध डोर संग

लहराती, इठलाती, बलखाती

जाती अनंत की ओर।


सुर-सुर

फर-फर करती

फैलाती पंख दिल खोल।


कभी इत घूम

कभी उत घूम

सर्राटे से सराबोर।


नटखट-नटखट

नव दृश्य दिखलाती

करती भाव-विभोर।


संग-संग, मिल-मिल

और पतंग जब आती अनंत की ओर

वे करतब करती, खेलती

मिलकर मचाती शोर।


होता परिवर्तन

जब नज़र लग जाती उनकी ओर

तब यह देख

नीचे मानुस प्रवृत्ति बन जाती चोर

आपस में पेंच उलझा देते

कटती पतंग की इक डोर।


उमड़-घुमड़ कर

जाती वो कुछ दूर

फिर आती धरती की ओर

जहाँ मनुष्य बैठा ताक में

झपट पड़ता उसकी ओर...।


~अनुज खर्ब/@Anujkharb2