दीवार पर बने
वो उड़ते हुये पंछी
कभी नही मिलते
जैसे लौटते हुये ख़्वाब
आ रहे हो...
लेकिन किसके लिये?
ये गुलाब भी तो सूख चुके हैं अब
उसके स्वागत से पहले
इनमें पहली जैसी
नमी,सुगंध भी तो नही
क्या इनका लौट जाना ही सही है...?
या देखो इन्हें
ये रूमाल पर लगे इनके निशान
सूखी नही जिनकी अभी यादें
आज भी रोंगटे खड़े कर देती है ये
पल भर ठहरकर
पकड़ लो इन काँटो को
शायद इसकी चुभन से
वो लौट आये
वो प्यार के उड़ते पंछी...।
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अनुज खर्ब


