असंख्य जूते निकलते घर से
शहर में जाते इधर-उधर हर रोज़
काले, सफेद, हरे, नीले, पीले, गुलाबी
हर रंग के जूते बिकते यहाँ रोज़।
सब रूप रंग में अलग-अलग
महंगे-सस्ते अजब-गजब
फिर भी पैरों में ही पहने जाते
कीमत जितनी हो अलग-थलग।
कदम बढ़ा जब वे चलते
देखते न वे लोग
दबाते
कुचलते
मसलते
वे पैरों को हर रोज़।
पुराने हो-हो कर जब वे घिसते
खुल जाता उनका जोड़
ऊपर से भी मुरझा जाते
दौड़! फिर मोची पर जाते लोग।
वह लगाकर टांका
सिल देता हर जोड़
फिर मार बुरिश पॉलिश की
चमका देता वह हर ओर।
लेकिन कसकर चमककर भी
पैरों की दुर्गन्ध न मिट पाती
कभी जूतों तो कभी मोजों पर
आरोपों की बरसात हो जाती।
बस निराश-हताश वो गुमसुम सा
कह न पाता वो
अंत में कोने में फेंका जाता
निर्वासित करके वो...।
अब बताओ तेरे मेरे किसके जूते
जिसकी है यह सोल...?
अनुज खर्ब


