इस नगरी में सब

किरदार की तरह जीते है

हर बार नया लिबास ओढ़ते है

पुराने से कोई लगाव नही

भीतर से न जाने कौन है

बाहर से सब बेहरुपीये बने है

कोई पहचान बनाने में

अपनी ही पहचान छुपाने में

साल तिमाही में बढ़ता है

और काम को टास्क की तरह 

रात-दिन में अंतर किये बिना 

डूब जाते है उसमें

जैसे लाइफ सिमट गई हो

एक स्टूडियो में

कलाकार होना आसान नही

हर पल एक नया सपना बुनता है

हर पल एक सपना मरता है

कौन जाने कलाकार का मन क्या है

यह तो ख्वाहिशों का पुलिंदा है

ख्वाहिशों का पुलिंदा है...।

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अनुज खर्ब