मन मेरे चल कहीं दूर

कोरे कागज़ के तले

जहाँ कुछ लिखा न हों।


इतना बेचैन क्यों है?

यहाँ खोकर भीड़ में

कभी तो खुद से बात कर

कभी तो दूर जा।


अब

मुझे ले चल

इन भावनाओं से दूर

जहाँ हर कोई हो जाता है अजनबी

तुमको जानकर

उठ गये हैं साथी भी

अकेला मानकर

आवारा हो जा तू

मन मेरे

चल कहीं दूर...।

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अनुज खर्ब