मां ने बनाई थी गूदड़ी

पुराने फटे कपड़ों की

कई तह लगाकर

सिल दिया था उसे

सुई में धागा पिरोकर

और बन गई थी वह बिछावन।


खूब बिछाया था मैंने उसे

जो अब स्टोर रूम में 

जाले बिछा रही है।


झुर्रियां पड़कर

पुरानी हो गई है वह अब

जोड़ों की जोड़ छूट गई है

धागे की पकड़ अब कहां

बूढ़े हो गए वे

चिथड़ों में भी-

बिवाइयां दिखाई देती हैं

जैसे यादें भी तो चिथड़ों में आती हैं

बस पैबंद लगा देने भर की देरी होती है

लेकिन इतना भी सामर्थ्य कहां मुझमें

सब कुछ समेटने का।


इतना साहस कहां से लाती थी तुम

कैसे थी रखती

हर चीज़ संजो के।


जैसे वो उसके लिए ही बनी हो


कहां चली गई तुम मां

याद आती हो तुम मुझे...।

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अनुज खर्ब