शाम होने को है
धूप भी मंद हो चली
पसर रहा है हवा में
जाड़ा धीरे-धीरे...
उड़ते परिंदे
लौट रहे है घोंसले की तरफ
गली में बैठा कुत्ता
पैर पेट में घुसाए दुबक रहा है
कार के नीचे धीरे-धीरे...
मसल रहे हथेली लोग
दांतों को चिपकाए
खींच रहे है साँसे
बदन को सिकुड़ाये धीरे-धीरे...
मौसम भी है चुप
और फीकी है अभी तक
विचारों की चाय
शब्द आ रहे हैं
लेकिन दबे पाँव
धीरे-धीरे...
बस शेष है तो
कल्पना के बिस्कुट का चूरा
जो बिखर रहा है हर तरफ
लेकिन धीरे-धीरे...।
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अनुज खर्ब

