लहरें लौट आई हैं
दूर किसी सागर को छूकर
एकजुट हैं ये
अपनी हिलोरी चाल में
जानते हुये भी
कि पास किसी किनारे पर पहुँच
टूट जाना हैं इन्हें चट्टान से मिलकर
लेकिन कुछ एक हैं इनमें भी
पहुँचेगी जो रेतीले किनारे
वहाँ सूखी भुरभुरी रेत को
कुछ पल नमी देकर
जाते जाते अपने आने का
सबूत छोड़ जायेंगी...।
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अनुज खर्ब


