कॉलेज का पहला दिन
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'स्कूल से निकलकर पहली बार स्वतंत्र होने का एहसास हुआ था जैसे जीवन अब तक तो केवल बेरंग चित्र था उसमें अभी-अभी रंगों का महत्व समझ आया हों। '
कॉलेज में पहले ही दिन इतना कुछ देख लेने की इच्छा मन में जग उठी थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि पहले दिन क्या करूँ? कैसे किसी से बात करने की पहल करूं? चेहरे पर हर किसी को देखकर वही चित-परिचित अंदाज वाली हल्की-सी मुस्कान लेकिन बात करने को मन होते हुए भी मन में हिचकिचाहट बनी हुई थी।
समय बीतता जा रहा था और मन में सवाल ज्यों के त्यों बने हुये थे। पहली बार जीवन में ऐसी कशमकश का अनुभव हो रहा था, जिसमें हिचकिचाहट के साथ उत्सुकता बराबर मात्रा में मन को बेचैन कर रही थी।
उस दिन कॉलेज से वापिस घर जाने की इच्छा ही नहीं हो रही थी, होती भी कैसे..उस दिन पूरे समय चेहरे की बत्तीसी हटी ही नहीं थी। किसी से बात करने से पहले 15-20 बार तो सोच ही लेता था कि ये नहीं ये पूछना चाहिए, ऐसे पूछना ठीक रहेगा, नहीं-नहीं थोड़ा अलग करना चाहिए- 'आफ्टर ऑल फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ लास्ट इम्प्रैशन'। बार-बार वॉशरूम जाकर बालो को देखता, थोड़ा चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा करता और फिर कपड़ो को अच्छे से देखता लेकिन बाहर आने से पहले हर बार मुँह धोकर जरूर आता क्योंकि भाई ताज़गी बनी रहनी चाहिए-
'जैसे हम हर चीज फल, सब्जी, मौसम, यहाँ तक च्युइंगम से लेकर नहाने के साबुन तक में ताजा-ताजा ढूंढते है। चाहे स्वयं कितने ही बासी क्यों न हों। यह तो फिर भी दिल की बात थी'
ख़ैर उस दिन निगाहें पता नहीं क्या ढूँढने में लगी थी- 'जैसे बच्चे टॉय शॉप में जाकर बस खो जाते हैं वैसे भी मैं खो गया था।' कुछ भी कहो जीवन का मज़ा उस दिन ही आ रहा था, एक अजीब सी संतुष्टि थी। सबको ऑडिटोरियम में जाने की सूचना दी गई लेकिन मेरा जाने का मन नहीं था लेकिन फिर भी गया। सभी जा रहे थे तो मैं भी हो लिया पीछे-पीछे। वहाँ कॉलेज का परिचय होने लगा... थोड़ा सुना, थोड़ा समझा क्योंकि उस दिन तो मन कहीं ओर ही था। बस मन में आ रहा था यह खत्म क्यों नहीं हो रहा।
'बार-बार आस-पास देख लेता लेकिन अँधेरे में कुछ दिखाई न देता जैसे सुबह की हरियाली के बाद अंधेरी रात आ जाती है। वैसे ही ये अंधेरा भी खूबसूरत रंगों को मेरी आँखों से ओझल कर रहा था।'
अब जैसे ही ऑडिटोरियम का ड्रामा खत्म हुआ तो फट से बाहर आया और फिर वही खुली साँस और वही फूलों की बहार। अब सबको स्नैक्स लेने जाना था लेकिन किसको खाने की पड़ी थी। मन के अंदर भावो की सुनामी जो उथल-पुथल मचा रही थी। बात करने को इतना मन था लेकिन किससे करूँ समझ ही नही आ रहा था। इसी आस भरी नजरों से सबको देख रहा था।
इसी बीच सूचना मिली डिपार्टमेंट में जाना है और वहाँ कुछ इंट्रोडक्शन होगा और आगे की सूचना मिलेगी। भाग कर तुरंत वहाँ पहुँचा। आफ्टर ऑल इस बार नये साथी जो मिलने वाले थे। पहुँचकर 'हँसी का फिर वही चिर परिचित अंदाज़ चेहरे पर आ गया जैसे मैंने दुख नाम का शब्द ही नहीं सुना हों। वहाँ परिचय हुआ लेकिन जो कहना था वो अब भी न कह सका। समय बीतता जा रहा था। ये इंट्रोडक्शन भी समाप्त हुआ लेकिन मन की बात उस दिन मन में ही रह गई। 'धीरे-धीरे लोग वहाँ से जा रहे थे और मेरे अरमान मेरे अंदर ही कहीं सिमटे जा रहे थे।'
सुबह से दोपहर और अब शाम कब बीत गयी थी, पता ही नही चला। अब मुझे भी निकलना था क्योंकि घरवाले भी चिंतित थे कि पहले ही दिन इतना लेट, तो अंततः मैं भी निकल लिया और पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि ऐसे नहीं वैसे करना चाहिए था, बात करनी चाहिए थी, ये-वो पता नहीं क्या क्या....।
'सूरज डूबने के साथ मेरे अरमान भी कहीं अस्त होते दिखायी दे रहे थे।' जो सोचकर आया था वह हुआ नहीं, सारी योजनाएं जैसे फाइलों में ही रह गई हों। उस दिन सरकारी बाबू बन गया था कि योजनाएं सब बनी लेकिन लागू एक भी न हो सकी।
दिल उदास हो गया, कोस रहा था अपने को। 'फिर जैसे-तैसे बिखरे हुए अपने मन को इस आस में समेटा कि कल भी तो आना है लेकिन कल कहाँ किसका आता है'- आपने सुना तो होगा -
"काल करे सो आज कर, आज करै सो अब |
पल में परलय होयगी, बहुरी करेगा कब ||"
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अनुज खर्ब


