बिस्तर पर लेटे हुए

आपस में पैरों को चिपकाए

उलझती हुई टांगों के किनारे

अँगूठे को छेड़ती उँगलियाँ

आज शरारत कर रही हैं।


दिमाग और शरीर का कनेक्शन

आज अचानक लूज़ हो चला हैं

साँसों की आवाजाही में

कोई गतिरोध नहीं

दिल अपनी आदत से मजबूर

रोज़ की तरह धड़क रहा है।


आंखें खुली हैं लेकिन

सामने मौजूद किसी भी

चीज़ को पहचानना नहीं चाहती

फिर भी मन में कोई सवाल नहीं

आज

कितने अजनबी है मेरे मुझमें मौजूद...।

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अनुज खर्ब