कल रात
मिली मुझे अपॉइंटमेंट
जब देख रहा था मैं कैलेंडर
आजकल खुद से भी अजनबी
खोजता हूँ चेहरों की पहचान
लेकिन बुद्धि के तहखानों में अब बिजली नदारद हैं।
याद है मुझे
इक रोज़ मुलाक़ात हुई थी
बैठकर खूब चाय के प्याले टकराए थे
झाँका था कैमरे के लेंस से
अंतर्मन की सीसीटीवी फुटेज को
और खंगाल के निकाले थे
वो सारे राज़ हृदय के चैम्बर से।
झाड़ा था गुर्दे के जाले को
साहस के डंडो से
और नस-नस में उलझी नफरतों को
प्रेम की उंगलियों से सुलझाया था।
करवाया था आजाद कैद से
हथकड़ियों में बंद स्मृतियों को
रिलैक्स कर आया था गुन-गुने पानी से
अहम से ऐंठी हुई मासपेशियों को।
सारे शरीर के मैल को
धोकर
सुखाकर
संजो आया था जीवन में
निर्मल हो गया था सब उस दिन
कई सालो बाद जो घर आया था।
लेकिन न जाने क्यों
खुद से सालो से न मिल पाया था।
अब सोचता भी हूँ तो
छुट्टियाँ कैलेंडर में ही आती हैं
लाल पेन चलाकर बना देता हूँ निशान
कि इक रोज़ मिल लूँगा
शायद इसी ख़्याल में
देख लेता हूँ कैलेंडर...।
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अनुज खर्ब


