कितना सहती

वह तोड़ती तट

प्रवेश करती इंसानो की बस्ती में

जहाँ मन में जमी गाद

मार्ग अवरुद्ध कर देती है

और भावनाएं मार्ग बदल

हो जाती हैं तितर-बितर

जैसे कोई आया हो वारंट लेकर

और कर डाला हो मन का सर्च ऑपरेशन।


तुम्हारी आँखों के सामने ही

जब आत्मीय चीज़ों की

परत दर परत

खाल उतारी गई हो।


ठीक उसके बाद

जिन चीज़ों को तुम

छूने से भी डरते थे

उनको नोचा गया हो सरेआम

फेका गया हो

बाजार में इधर-उधर।


उस एक-एक चोट पर

तुमने अपना मुँह सिकोड़ा होगा

जैसे गहरा धक्का लगा हो

हृदय पर धम्म करके

लेकिन उनको क्या पता

कितनी मुश्किलें आई होंगी

यादों की तय बनाने में

कितने साल लग गए होंगे

इनको संजोने में

और एक ही झटके में

यादो के घर पर

बुलडोजर चला दिया गया।


और ये चीज़े दूर से तुम्हें

मरते-मरते भी आस में निहार रही हो

लेकिन तुम असहाय से बन

मौन खड़े रहते हो

जैसे द्रौपदी के चीर हरण के समय

वो महापुरुषों की सभा

बैठी देख रही थी सब चुपचाप...


जवाब तलाशता हूँ मैं जब इनके

तो मेरे भीतर

जीवन के असंख्य छेदों से

रोज़ नए भंवर बनते हैं


मैं धीरे-धीरे तट से दूर होकर

उनकी ओर बढ़ता हुआ

कुछ ही पल में ओझल हो जाता हूँ

और जब आँखे खुलती है तो

खुद को नदी की तलहटी पर पाता हूँ


फिर पानी के अंदर के वे बुलबुले

कुछ देर में ही गुड़-गुड़ करते हुए

लगातार छोटे होते जाते हैं

अंत में गुप्प सन्नाटा

शेष रह जाता हैं

और ऊपर कल-कल करती

जीवन की नदी

हाँ ! यह जीवन नदी तो हैं

लेकिन

जिसके किनारे अब नज़र नहीं आते...।

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अनुज खर्ब