हर घर से न्यायाधीश निकले

लेकर झण्डे को हाथ

नारा लगाकर कहते..मेरा झण्डा है तुझसे साफ़।


न्यायाधीशों की इस टोली में सबका है अलग मिज़ाज

एंकर, नेता, विद्यार्थी, शिक्षक और मेरे प्यारे लोग

सभी ने सुनाये फैसले बारम्बार।


लगती रही बोली लोकतंत्र की इस बार

अरे भैया! सांस तो लेलो एक बार।


बाज़ार में आये है तो कुछ खरीद लें

नैतिकता उधार मिलेगी क्या यार?

अरे ये क्या मांग लिया

माँगना चाहिए था आपको अधिकार

नैतिकता तो आजकल आउट ऑफ़ डेट है

अधिकार मांगना आज का यही ट्रेंड है।


कोने में बैठा..सिमटा सा कर्तव्य था बेचारा

बोला! मेरा भी तो कोई सोचो एक बार?

पीछे से आवाज आई..चुप बे! तू कौन?

कर्त्तव्य बोला! कुछ नहीं...! तुच्छ प्राणी हूँ जनाब

तुच्छ प्राणी ये बता मजमा किधर सजा है?

जनाब! दिल्ली अभी दूर है...

मजमा तो वही लगा है।


अरे कहा था न कर दो देश के कई भाग

लो काटो रस्ते में सारी रात।


मालिक आँखे खोलिए मजमा आ गया

देखिये खूब सजा है दरबार

वो भीड़ का हुजूम है..

नहीं नहीं वो लोकतंत्र का खून है।


मजमे में आज राइट और लेफ्ट का दंगल है

जीतेगा कौन जनाब?

अरे! लोकतंत्र के इस अखाड़े में 

जितने के लिए सविंधान की हत्या होगी।

तू देख फेसबुक ट्विटर पर फ़ोटो लगेगी बार बार..

और सभी का स्टेटस होगा

देख! मेरा झण्डा है तुझसे साफ़...।


अनुज खर्ब