हमारी कलम से स्याही निकलती हैं
और हम अपनी मिट्टी में नफ़रत घोल देते हैं
और वे वहाँ दूर किसी वीरान में
पहाड़ में ठिठुरते हुये
अपने खून से देश की सुरक्षा के लिये
सरहद को सींच देते हैं।
हम यहाँ जीत का दंभ भरते हैं
वे अपनी जीत को भी
हमें सौंप देते हैं।
आसान होता है हमारे लिये
सबको परिवार कह देना
वे अपने परिवार से दूर रहकर भी
हम सबके परिवारों को अपनी सुरक्षा सौंप देते हैं।
हम यहाँ सब होते हुये भी
सबकी खुशियों को देख
दुखी हो लेते हैं
वे वहाँ अपनी खुशियों को भी
हमें सौंप देते हैं।
नमन हैं उन वीर जवानों को मेरा
जो अपने से पहले देश की सोचते हैं...।
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अनुज खर्ब


