जब अंधकार जगत में छाया था

जीवन पर दुष्टों का साया था

गरीबों की छाती पर

पांव रख उसने

अपने महलों को बनाया था।


यह काल का परिहास था

कर रहा वह अट्टहास था

जंघाओं पर हाथ पटक कर

कर रहा वह उपहास था।


तब उस काल रात्रि में

आसमान में कौंध रही

बिजली की उच्छ्वास थी

जमुना अपने रौद्र रूप में

तटों पर सराबोर थी।


बेड़ियों को तोड़ रही

शक्ति वह अपार थी

स्वयं दरवाजों को खोल रही

वह काल की हुंकार थी।


जन्मी थी वह 

नंदलाल बचाने को

हुई सुरक्षा, जन्मे कान्हा

किया सृष्टि का उद्धार जो।


आया माखन चोर

बजी बांसुरी चहुँ ओर थी

नस-नस में दौड़ रही

वह प्रेम की डोर थी।


हर वर्ष होता उल्लास अब

काशी से लेकर मथुरा तक

घर-घर धूम मचती 

श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर

लेकिन

प्रश्न अब ये आता है

रह रहकर मन में अटक जाता है

न होती शक्ति तो

कौन करता संहार वो?

न होती शक्ति तो

कैसे होता संहार वो...?

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अनुज खर्ब