रोड़ी बदरी पर बैठे बच्चे
देख रहे थे
ईंट ढोते हुये पिता का
लाल हो जाना।
हर पसीने की बूंद पर
तोड़ रहे थे
अपने सपनों का बेलदार हो जाना।
एक टक
बिल्डिंग की ऊँचाई को दौड़ाते
देखते! अपने सपनों का
मिस्त्री हो जाना।
ठेकेदार की हर गाली पर
देखते! अपने सपनों का मर जाना...।
अनुज खर्ब/@Anujkharb2


