शाम थककर
भारी होती पलकों को
आधा मूंदे
अपने पांव पसार रही है
और धीरे-धीरे लाल होता सूरज
ढलने को है।
पवन का वेग
अब सुस्त हो गया है
पक्षी अपनी अंतिम उड़ान भर चुके हैं
झील के पानी की मछलियां
अब दूर कहीं गहराई में सुस्त हैं।
कदमों की
चहल-पहल बढ रही है
लोग लौट रहे हैं रोज की तरह
दूर कहीं से सिटी बजाता गार्ड
किसी युगल की खोज में
हर एक पेड़ को टटोल रहा है।
एक बूढ़ा ठूठ यह सब
चुपचाप देख रहा है
उसकी चाल धीमी है
धीरे-धीरे वह सबसे पीछे होता जा रहा है
आखिर में पहुँचकर भी वो हारता नहीं
बस कहता है 'रात होने वाली है..।
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अनुज खर्ब

