जब-जब ढूँढने की कोशिश करता हूँ तुम्हें, 

तब-तब डिम लाइट हो जाती हों,

अँधेरे में रोशनी देती हो मुझे,

उजाले में कहीं खो जाती हों।


वक़्त लगता है मुझे

उजाले से अँधेरे में आकर देखने में,

पर वहाँ भी तुम

मेरी पुतलियों को सहला देती हों।


छाया हो तुम मेरी,

अँधेरे में मुझमे समा जाती हों,

और धूप में मुझे तप्ता देख,

मेरी छाया बन जाती हों।


मैं वर्टीकल होकर चलता हूँ,

तुम हॉरिजेंटल हो जाती हों,

मैं जितना भी ऊँचा उठता हूँ,

तुम जमीन पर मेरी आकृति बन जाती हों।


शिकायत हैं मुझे उस ईश्वर से,

कि इतनी पास होकर भी तुमसे मिल नहीं पाता,

मगर भाग्यशाली हूँ इस बात का,

कि जीवन के हर मोड़ पर तुम मेरे साथ चलती जाती हों...।

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अनुज खर्ब