कुछ होने से पहले

और उसके बाद

देखता हूँ दो अलग चरित्र

खोल में छुपे बैठे दुबके

अवसर की तलाश में

शनैः शनैः प्रबल होते

धीमी-धीमी चाल में...


हुआ पहले-पहल जब स्पर्श

हल्की-सी सरसरी सरसराहट में

अंदर पैदा हुई एक ऊर्जा

हल्की सी कपकपाहट में...


होंठो की फड़फड़ाहट में

गहरी साँसों की आहट में

साझा आरोहों बनी आज फिसलन

बरसों से सोए हुए ख्वाब की चाहत में...


इस बीच रोम भी सिहर गए

गेसुओं ने आकर्षित किया

चुपके से शरारत हुई

और हरारत होने लगी...


बस न जाने क्यों अंत में आते ही

आलिंगन भी विरक्ति-सा लगने लगा

उस क्षण जाना मैंने

जुड़ाव के पेड़ से

अलगाव का फल निकलता है...


जैसे कई आदमी छिपा रखें हैं

तुमने अपनी खोल में

और मैं अभी तक

दो के फेर में ही उलझा हूँ...।

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अनुज खर्ब

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