आसमान के झरोखों से झाँकता चाँद
आज घटाओं की चादर ओढ़े था
चाँदनी भी सिकुड़कर
लजा रही थी तारो की छाँव में
हो रही थी खूब हँसी-ठिठोली
खेल रहे थे वह आँख-मिचौली।
उस दूधिया माहौल में
इशारों से
प्रेम पत्र का इज़हार था
कभी चुपके से चाँद मुस्कुरा देता
तो कभी धीरे से चाँदनी आँखे मूँद लेती।
मानो नैनों की डोरी
घूँघट से खींच रहे हो दोनों
मद्धम-मद्धम पवन के झोंकों से
पल्लू उड़ रहा था।
संभल-संभल
धीरे-धीरे
हरकत हो रही थी
रंग-रंग
अंग-अंग
संग-संग
झूम रहे थे
मौसम के झूले
और आसमान के सितारे
जगमग-जगमग
टिमटिम-टिमटिम
प्रकाश पुंज बना रहे थे।
लेकिन उन तारों के बीच भी
वो नितांत अकेले थे।
सब कुछ तो भावो से बयान हो रहा था
जैसे उसे देख मौन भी सिहरन से काँप उठा हो
और बैठ गया हो देखने के लिए
कि ये रात बड़ी सुहानी है...।
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अनुज खर्ब

