कितना गहरा दर्द है
जेबड़ियों से बंधी उस चारपाई का
जो हर बैठने वाला उसे देता है
बिना उसकी मर्ज़ी के
बस यूँ ही...
आह से भरी
चर्र-चर्र करती उसकी सिसकियां
बिना कुछ पूछे
बस ढल जाती हैं हमारे लिए
बस यूँ ही...
क्या जाना है तुमने
कभी उस बोझ को
जो वह जीवन भर
प्रतिपल सहती है
बस यूँ ही...
सुना है कभी
रात को कराहती उसकी आवाज़ को
जो हमारी हर करवट पर
उसे मिलती है
बस यूँ ही...
देखा है कभी
उसकी हाँफती साँसों को
जब उसे पीटा जाता है
डंडो और लातों से
बस यूँ ही...
महसूस किया है कभी
उसके अकेलपन को..
अँधेरे में गुम उसकी तन्हाई को
चुपचाप कोने में दुबके मौन को
उस अनचाहे भय को
जो वह सहती है
बस यूँ ही..
बात की है उससे कभी
नही न...?
वह भी तो बोलना चाहती होगी
अपनी मर्ज़ी से जीना चाहती होगी
उसे भी तो बहुत कुछ कहना होगा
उसे भी तो हँसना होगा
उसके भी तो सपने होंगे
उसकी भी तो ख़ुशी होगी
उसकी भी तो मर्ज़ी होगी..
लेकिन हमें क्या
पता है क्यों..?
बस यूँ ही...।
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अनुज खर्ब

