गांव के बाहर खड़ा

बरगद का पेड़

नितांत अकेला

बरसो से न सोया वह।


मन्नतों की डोर से बंधा

शरीर उसका,

जिसकी जड़ो ने आसमान और

ज़मीन तक को छू लिया था।


देख रहा है वह पलायन

धीरे-धीरे

घटते-घटते

किसान का मजदूर हो जाना...।

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अनुज खर्ब