गांव के बाहर खड़ाबरगद का पेड़नितांत अकेलाबरसो से न सोया वह।मन्नतों की डोर से बंधाशरीर उसका,जिसकी जड़ो ने आसमान औरज़मीन तक को छू लिया था।देख रहा है वह पलायनधीरे-धीरेघटते-घटतेकिसान का मजदूर हो जाना...।___________अनुज खर्ब
गांव के बाहर खड़ाबरगद का पेड़नितांत अकेलाबरसो से न सोया वह।
मन्नतों की डोर से बंधाशरीर उसका,जिसकी जड़ो ने आसमान औरज़मीन तक को छू लिया था।
देख रहा है वह पलायनधीरे-धीरेघटते-घटतेकिसान का मजदूर हो जाना...।___________अनुज खर्ब