नीले समन्दर में
रुई के बादल की कश्ती
देख ! खुली आँखों से
टक-टकी भर ली मैंने
डबडबाई जब आंखें
भर उठा मन मनचला
छलक उठा हृदय मेरा
बह गया उनके बीच
स्वप्न मेरा असुवन-सा।
टपक धरती पर
छिटका जब चारो ओर
बिखर गया टुकड़ों में
स्वप्न मेरा असुवन-सा...।
____________
अनुज खर्ब


