दफ्तरों में हलचल हैं

एकाएक कुर्सियों में कम्पन हुआ हैं

रद्दी को नई जिल्द से

सजाया जा रहा है

कदमों ने बहुत दिनों बाद

गति को महसूस किया हैं।


हर एक ऊपरवाला

नीचे वाले को आंखें दिखा

कामचोर कह रहा है।


सफेद पोशाक आज

फिर से घिसी गयी है

दीवार पर टँगी 

गांधी जी की तस्वीर

आज हिली है।


बाहर सड़कों को रंगा हैं

दीवारों को ऊँची कर

बस्तियों को ढका हैं

देखों तो

लगता है कोई आने वाला है...।

__________

अनुज खर्ब