शब्द आज दुबक कर पलंग के नीचे

छाती में घुटने को दबाए

सिकुड़े बैठे कप-कपा रहे है

अब उनके शरीर में गुदा नहीं

सिर्फ हड्डियों का ढाँचा है

उनके दाँत कड़-कड़ा कर

ठिठुर रहे है लगातार

अब उनमें तीखापन नही

मुख से सिर्फ झूठ निकलता है बेख़ौफ़

क्योंकि सच का 'स' सोया है चद्दर तानकर

और 'च' चप्पल के नीचे 

छपा है कीड़े की तरह

जिसके ऊपर जोर से प्रहार किया गया

और वह चिपक गया उसकी सतह पर

पट से पिच करके...

उठेगा नही वह

और दूर कालाहांडी से आती

उसकी पदचिन्हों की आवाज़

लगातार तेज हो रही है

वह बढ़ रहा है यहाँ

जहाँ हमारे कंधे झुके है शर्म से

और वह उठाकर ला रहा है

अपने कंधे पर इंसानियत की लाश

वह उसकी पत्नी नहीं

समाज का पार्थिव शरीर है

जिसकी घोषणा हो चुकी है

कि इंसान मर गया है...।


हम और आप अब

उसकी अंत्येष्टि में जायेंगे

लेकिन हम ये भूल रहे है

कि हम तो खुद मृत है...।

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अनुज खर्ब