पहाड़ों को किले और मंदिर दिए
धरती को शांति,
जंगलों को ऋषी-मुनि
और नदियों को माता का दर्जा.
हमने तरक्की कुछ यूँ की
पहाड़ों का पेट चीरा और रफ़्तार अपनी बढ़ाई
धरती का हृदय खोला और तिजोरियां अपनी भरीं
जंगलों के वक्ष काटे, खुद के लिए आशियाँ बनाये
नदियों को विष पिलाया और हाला हमारा जल बनी.
हम आदमी बहुत छोटे हैं
आधुनिक बहुत सही
हम आदमी बहुत खोटे हैं.


