ये वृक्ष जितने गम्भीर और सधे हुए हैं शायद उतने ही चालाक भी. संभव है, जब माँ प्रकृति हमें विनाशोन्मुख, विवेक-शून्य अपने आप से दूर जाता देखती हो तब धुंआधार बारिश से उसके अश्रु दुःख की अभिव्यक्ति करते हों अहा! कितना मधुर है किन्तु उसका रुदन भी
संभव है, वृक्षों को माँ प्रकृति को यूँ अपने सामने रुदन करता देख कुछ असहजता की अनुभूति होती हो तभी तो जब भी टप-टप बारिश होती है तब ये बहुत प्रेम से भींगते इंसान को आसरा देने बुला लेते हैं अपने पास आह! कितना कटु है एकांत का घूँट भी पानी की धार जितनी तेज़ होती है वृक्षों की छाँव उतनी ही अधिक शीतल शायद वे भी भींग जाते होंगे हमारे संवेदनाहीन हॄदय को देखकर और जब बादल आपस में पानी की होली खेलकर थक जाते हैं, तब ये प्रौढ़ से दिखने वाले वृक्ष अपना बचपना दिखाते हैं और दिन भर उसके नीचे की धारित्री का जलाभिषेक चला करता है. जो पथिक बारिश से बचने आये थे, उनके पट पर भी अब टपा-टप पानी बरसता है बादलों की गलती थी कि वे धैर्य नहीं रख पाये और वृक्षों का छल था कि वे पानी से दूर भागते आदमी को यूँ कोरा नहीं लख पाये प्रकृति का प्रयास है जैसे हर माँ का होता है कि उसके बच्चे उसके पास आते रहें कि मटके कच्चे अग्नि-ताप पाते रहें...