स्तब्ध हूँ मैं, निराश भी हूँ; जमीं से रूठा, आकाश ही हूँ   अटवी में इन अंधों की, भटका हुआ प्रकाश ही हूँ!   रुदन-क्रंदन रत जनों से घिरी उस दग्ध चिता का उल्लास ही हूँ!   ईश्वर को ईश अरु, इंसानों को उपहास ही हूँ   दूसरों हेतु अपंग किंतु, शक्तियों का प्रवास ही हूँ   त्यक्त-गुप्त-अति-विस्मृत सतत, मात्र संतों की तलाश ही हूँ!