खूब पानी पी लेने के बाद
फिर कुछ करिश्मा होता है.
जिस जमीं के अंदर वो नन्हे दाने गाड़े गए थे
वहीँ पर से एक छोटा सा
कुदरती नक्काशी का जड़ा
बहुत नाज़ुक सा पौधा उठ चहकने लगता है.
मुझे बताया गया है
कुछ दिनों बाद ये खुद्दार पौधा
अपने पिये पानी का क़र्ज़ चुकाने
आदमी की भूख ताउम्र मिटाएगा.
बहुत सोचने के बाद आज मैंने
एक नादानी भरा सवाल बड़ी बेशर्मी से पूछ लिया है -
जब एक नन्हा सा दाना किसी के दिए पानी
का कर्ज इतनी ख़ुशी अपनी जान दे चुकाता है,
क्यों न हम कर्ज से दबे आदमी को गाड़ने का सलीका भी बदलें
क्यों न हम उसको भी खुद्दार दानों सा बो दें?
मेरा खेत, उसकी जमीं, आदमी का पानी और
हर एक आदमी
अभी तक मेरे इस वाहयात सवाल पर
मौन है.
