इतिहास को लेकर कभी अपने करों में, देख पाते अल्प कुछ ये नेत्र जो वह स्यात् कोई धैर्य से फुंफकारता ही सर्प का षडयंत्र है अल का निमंत्रण नित घातने बैठीं हमें इतिहास-कलमें ।1।   देख पाओ तो सुनो वे दृश्य नहीं अब और नहीं स्वच्छन्द उनकी चीत्कारें वे गये सो गये अब कुछ देख-सुन के विचारें हम यही अपना हाल होगा चीत्कारें-दृश्य ये भी नष्ट होंगे ।2।   और कुछ तो क्या कहूँ पर मित्र मेरे जो अतीत अति प्रीति से है पढ़ा हमने, पाकर अनागत में कोई मति हम सरीखी कैद पन्नों में हमें भी ताड़ लेगा हम बनेंगे कुछ अगर तो चंद अक्षर ।3।   वक्त के इस कारखाने में अभी तो दुःख केवल, सुख नहीं, है नित्य बनता मलिन अति दुर्गन्ध युत उत्पाद इसके शूकरों सम हम सदा ही चांटते हैं विष्टा ही अमृत हमारा बन चली है ।4।   और ये उत्पाद कोई कैसे रोके? काल का यह कारखाना सतत चलता एक क्षण को भी रुके तो यत्न करते पर सफाई को यहाँ अवकाश नहिं है समय की ही दासता जीवन विवशता ।5।   “तो नहीं कुछ उपाय?” वह भी खोज लें हम सोच कर कुछ यत्न, हम मन-बुद्धिधारी काल के आगे नपुंसक किन्तु हाँ हम स्वतंत्र हैं नहीं-भोगने उत्पाद इसके जब नहीं ग्राहक दुकानें क्यों चलेंगी? ।6।   क्यों न हम बन जाएं निष्ठुर पत्थरों से अछूते अति कठोर, भीषण यातनायें हों तो हों पर अद्रि हम निष्कंप स्थिर सदा निज में लीन हों संतुष्ट होकर अहो! शैलों के हृदय ही जल भरा है ।7।   देखकर यूँ बंद अपने श्याम धंधे आएगा खुद काल ही रोता हुआ सा “ मम प्राण के आधार प्रभु! क्या प्रिय तुम्हें है? कहो मैं वह सदा को प्रस्तुत बना दूँ!” पर अरे जो तृप्त वह वांछारहित है! ।8।   और तब यूँ शांत हमको देखकर ही और खुद को पराजित ही मानता सा समय का वह कारखाना स्व-अश्रुओं से परिशुद्ध हो करने लगेगा सुख-विवर्तन! पर हमें क्या, तृप्त अति खुद 'समयधर'  हम! ।9।