हमने पहाड़ों में नक्काशी की
नदियों के रास्ते बदले
हवा में गंध घोलने की हिम्मत भी हम कर आये हैं,
और अब, थमने के सारे ख़याल हमसे शरमाये हैं
खेतों को बिना बारिश के
और बागों को बिना परवरिश के
हमने सम्भालना भी सीख लिया है
हम जब चाहे मछलियों को पैदा कर सकते हैं
मधु मक्खियों से शहद
और रेशमी कीड़ों से उनके बदन के रेशे भी हम
यथासमय अपनी मर्ज़ी से ले सकते हैं
बेमौसम बारिश,
हवाओं का बहक जाना
और धरती का काँपना
हमें डराता तो है कभी-कभी
पर हमें अपने बाजुओं पर न सही,
अपनी बेलगाम होती डेढ़ अक्ल पर तो इतना भरोसा है ही
कि आज नहीं तो कल
हम मौसम को भी काबू में कर पायेंगे
और इस बीच कहीं हम असफल रहे
तो घबरायें नहीं, पृथ्वी पर न सही
हम मार्स पर ही जीवन बितायेंगे
किसी भद्दे मज़ाक की तरह
कितना बौना है हमारा ये अन्दाज़ भी
कि हम धरती और उसकी तमाम औलादों के साथ
खिलवाड़ करें, मनमर्ज़ी करें
और प्रकृति बुत सी बनी
हमसे शराफत से पेश आये!
प्रकृति होश में है, प्रौढ़ है
इसलिए मौन है
उसे हमारी औकात पता है
कि ये बहके बौने कौन हैं.


