कभी कभी कुछ भूल जाती है
पता नहीं वो कितना कुछ याद रखना चाहती है।
कभी तकिए के नीचे कभी सोफा के पीछे
कुछ दूंढते रहती है
पता नही वो क्या क्या पाना चाहती है।
नमी रहती है आंखों में कितनी ही बार उसकी
पता नही वो अंधेरे में क्या क्या बहा देती है।
तुम हंसते भी रहते हो तो जान लेती है सबकुछ
पता नही वो कौन सा किताब पढ़ती है।
वो सबको इतना कुछ देना चाहती है
पता नही वो ईश्वर से क्या क्या मांग के ले आती है।
अक्सर कोई अधूरी कविता लिख के रख देती है
पता नही वो और क्या क्या पूरा करना चाहती है??
