मन की पीड़ा 

मन में ही रहती है चुपचाप सी

ना कहती है किसी से कुछ भी

और कह भी दे तो कोई समझता नहीं।

फिर वो सोचती है , क्यू जन्म हुआ मेरा

कौन हूं मै?

अनजान है वो इस बात से

सुन ले कोई ,समझ ले हर बात 

तो उसका जन्म कभी हो ही न।।

और फिर वो जन्म देती है महान कवियों को

ग़ज़ल और गीतों को

वो जननी है चाणक्य की रणनीति की

और चक्रवर्ती समार्टो की 

उस पीड़ा से ही बुद्ध की साधना हुई

उसने ही गांधी को संघर्ष दिया

जब जब वो मन में जन्म ली है

जिसने भी हृदय में पाला उसे

तब तब वो नई रचना करती है

एक नई हस्ती बनती है।

__अनु