किष्किंधा के अरण्य में विचर रहे श्री राम 

साधु वेश धर मिले, पवन पुत्र हनुमान 


पूछे प्रभु से प्रेम वश, परिचय दे श्रीमान 

धरै तपस्वी वेश विचरें, ताने तीर कमान


बोले प्रभु, मुनिवर परिचय, अवध कुमार श्री राम  

आप कहें इस घोर अरण्य, पड़ आया कौन सा काम 


रघुवर परिचय जान पवन सुत, भय आनंद हर्ष विभोर 

प्रभु सामने हनुमत जैसे चंदा समक्ष चकोर 


चरण पकड़ श्रीराम, पवन सुत पुनः धरै वानर वेश 

कानन कुण्डल, कंचन वरण, रखैं कुंचित केश

  - अंशुमान